भारत बायोटेक के चेयरमैन ने बताया कि कोवैक्सीन के 10 मिलियन डोज तैयार हो चुके हैं, सरकार से आपात इस्तेमाल की मिली मंज़ूरी

कोवैक्सीन को बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक के चेयरमैन ‘कृष्णा एला’ ने बताया कि ‘क्लिनिकल ट्रायल’ मोड में कोवैक्सीन को बाजार में लाने की मंजूरी मिल चुकी है। उन्होंने बताया कि कोवैक्सीन की 10 मिलियन खुराक तैयार हो चुकी हैं और प्रभावकारिता डेटा, COVID से बचाने के लिए वैक्सीन की क्षमता दिखा रही थी। कोवैक्सीन को 19 मार्च तक उपलब्ध कर दिया जाएगा।

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Govt of India Approved Co-Vaccine

एक ऑनलाइन मीडिया सम्मेलन में ‘कृष्णा एला’ ने भारत बायोटेक की कोवैक्सीन के बारे में यह जानकारी दी है। उन्होंने कोवैक्सीन को ‘बैक-अप-वैक्सीन’ कहने पर भी अपनी बात कही और इस बात पर अपना रोष भी प्रकट किया। और कहा कि लोगों को ऐसे बयान सोच समझ कर देना चाहिए। वैक्सीन का काम लोगों की सुरक्षा करना है और इस वैक्सीन को लेकर तथाकथित बैकअप का कोई सवाल ही नहीं है।

भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के कई वैज्ञानिकों ने कहा – कोवैक्सीन भारत में बनाई जा रही कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ बेहतरीन वैक्सीन साबित होने की सम्भावना है।

श्री एला ने कहा, इस वैक्सीन का प्रभावकारी डेटा तुरंत प्रदान नहीं किया जा सकता है क्योंकि परीक्षण 20,000 से अधिक स्वयंसेवकों में चल रहा है और नैदानिक परीक्षणों की प्रकृति इस तरह के “अस्पष्टता” की अनुमति नहीं देती है।

कोवैक्सीन के बेहतरीन वैक्सीन है और उम्मीदवारों पर किए गए परीक्षण में इस वैक्सीन ने अभी तक कोई साइड इफ़ेक्ट नही दिखाया है। जानवरों पर भी इसी वैक्सीन का कोई साइड इफ़ेक्ट नही दिखा है। यह वैक्सीन शरीर में कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ मज़बूत ऐंटीबाडी बनाती है, जो कोरोना वायरस से लड़ने में मदद करता है और लोगों की सुरक्षा करता है।

अभी भी कोवैक्सीन का परीक्षण किया जा रहा है, इसलिए इसके बारे में ऐसी टिप्पणी करना अपने आप में भारतीय कम्पनी के प्रति दुर्भावना के शिवाय कुछ नही है। उन्होंने कहा – मैं सहमत हूँ कि अभी इस वैक्सीन का परीक्षण जारी है। लेकिन जापानी एन्सेफलाइटिस, रेबीज या यहां तक कि मौसमी फ्लू के खिलाफ भी इसी तरह टीके विकसित किए गए थे।

उन्होंने रेखांकित किया कि 2019 क्लिनिकल ट्रायल नियमों में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि किसी आपात स्थिति में अप्रयुक्त दवा या वैक्सीन के चरण-2 डेटा जिससे सुरक्षा हो सकती है और इसकी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया स्वीकार्य हो उसी के आधार पर, उसके इस्तेमाल की इजाजत दी जा सकता है। उन्होंने बताया की मैं केवल कानून बता रहा हूँ क्योंकि यह मौजूद है, इसलिए हमारी कम्पनी वैक्सीन क्यों नहीं लॉंच कर सकती? हम एक आपात स्थिति में हैं और जीवन दांव पर है।

ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ़ इंडिया ने कोवैक्सीन को क्लिनिकल ट्रायल मोड में मंजूरी दे दी है, जिसका अर्थ है कि चरण-3 ट्रायल जारी रहेगा (जहाँ कुछ को वैक्सीन मिलती है और कुछ को नहीं) और यह एक साथ ट्रायल के बाहर वालों को भी दिया जाएगा।

उन्होंने कंपनी का नाम लिए बिना – सीरम इन्स्टिटूट आफ इंडिया के कोविशिल्ड वैक्सीन को दी गई मंजूरी पर भी सवाल उठाया, जो ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका वैक्सीन पर आधारित है और लगभग पूरी तरह से यू.के. में उत्पन्न प्रभावकारिता डेटा पर निर्भर है।

इस वैक्सीन के यू.के. में किए गए परीक्षणों ने व्यापक रूप से भिन्न-भिन्न प्रभावकारिता दिखाई है। भारतीयों में यह कैसे प्रभाव दिखाएगी इसके बारे में कोई डेटा उपलब्ध नही है। यह अच्छी तरह से ज्ञात है कि चरण-3 के परीक्षण के दौरान कुछ बैचों को केवल आधी खुराक मिली थी। अगर भारत में मेरे साथ ऐसा होता तो मैं चुप हो जाता। भारतीय उत्पाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, लेकिन मैं देख रहा हूं कि हमारे कुछ वैज्ञानिक मुझे कोस रहे हैं। यह सही नहीं है।

यह हमारी घटिया सोच के अलावा कुछ नही है की हम सब भारतीय प्रोडक्ट को नकार देते हैं, भले ही वह कितना भी अच्छा क्यों नही हो और विदेशों के बेकार प्रोडक्ट का इस्तेमाल करना अपनी शान समझते हैं। कोवैक्सीन के मामले में भी यही हो रहा है, हम एक तरफ़ कोवैक्सीन को बैक-अप-वैक्सीन बता रहे हैं और दूसरी तरफ़ एक ऐसी वैक्सीन को इस्तेमाल करना चाहते हैं जिसका भारत में ना तो पूरा परीक्षण किया गया और इसके साइड इफ़ेक्ट भी दिख चुके हैं, जबकि कोवैक्सीन के अभी तक के परीक्षण में कोई साइड इफ़ेक्ट भी नही दिखाई दिया है।